Friday, May 7, 2021

Chilchilati   dhoop  mein 

Chhaon dhoondhne baitha
Main ek ped ke neechay
Sahsa ek phool aake gira
Meri goad mein
Maine saharsh uthaya
Us pyare se phool ko
Soonghne ke chesta ki
Uski sugandh ki jad mei
Aake bol utha yahi hai
Prakriti ka komal sparsh

चिलचिलाती धूप में 
छांव ढूंढ कर बैठा 
मैं एक पेड़ के नीचे
सहसा एक पूल अकेगिरा 
मेरी गोद में 
मैने सहर्ष उठाया 
उस प्यारे से फूल को
सूंधने की चेष्टा की 
उसकी सुगंधकी जद में
आके बोल उठा यही है
प्रकृति का कोमल स्पर्श

नित्यांश 10इ


Sunday, May 17, 2020

शिक्षा आंदोलन - विद्यालयों की मनमानी

आंदोलन को ऐसे लड़िये
जब फीस माफ़ी हो जाये
तो बच्चो को निकालिये
पैसाखोर स्कूलों से
और डालिये सरकारी में
फिर आंदोलन कीजिये
सरकारी अच्छा पढ़ाएं |
आखिर जब हम
देने में सक्षम नहीं
तो क्यों पढ़ाएं महंगे में
जब सस्ता उपलब्ध हो
तो काम चलाएं सस्ते में |
जिनका साल हो बोर्ड का
उनकी फीस भरे सरकार
नहीं तो के.वी. ले प्रवेश
हो बच्चों  का उद्धार |







Saturday, February 22, 2020

ज़रा इस आदमी को जगाओ !

भई, सूरज
ज़रा इस आदमी को जगाओ !
भई, पवन
ज़रा इस आदमी को जगाओ !
यह आदमी जो सोया पड़ा है,
जो सच से बेखबर
सपनों मेँ खोया पड़ा है।
भई, पंछी
इसके कानों पर चिल्लाओ!
भई सूरज! ज़रा इस आदमी को जगाओ !
वक्त पर जगाओ,
नहीं तो जब बेवक्त जगेगा वह
तो जो आगे निकल गए हैं
उन्हें पाने-
घबरा के भागेगा यह !
घबड़ा के भागना अलग है,
क्षिप्र गति अलग है,
क्षिप्र तो वह है
जो सही क्षण मे सजग है ।
सूरज, इसे जगाओ
पवन,इसे हिलाओ,
पंछी , इसके कानो पर चिल्लाओ !
11052078060557

Thursday, January 16, 2020

धरा पुकार रही

बची तृष्णा और 'मैं' को होलिका दहन में भस्म कर दो
चीर गगन को हुंकार भरो और उद्घोष कर दो
आ रहे हैं रण में  मौर्यवंशी शौर्य पताखा लहराकर
पाञ्चजन्य  शंखनाद से शत्रु के हृदय को विदीर्ण कर दो
बची हुई जो मृग अभिलाषा , उसको जीर्ण कर दो
उठो धरतीपुत्र धरा पुकार रही है यह बतलाकर
किञ्चित  नहीं मिलेगा ये अवसर, रक़्त को शुद्ध कर दो
वीर प्रबुद्ध ललकार प्रचंड , विकराल दैत्य का घमंड तोड़ दो

@रतीश 

Wednesday, September 26, 2018

मैं पूर्वाग्रही नहीं हूँ

मैं पूर्वाग्रही नहीं हूँ और न ही डाटा एनालिटिक्स. ..  अरे वही कैंब्रिज अनलिटिका वाले के तरह। ....लेकिन मैंने ये कविता फिर से पोस्ट की उसका मकसद था। ....... अब आप देखिये दो घटना यूपी में ही हो गयी। .... . १. संगीत सोम पे हमला और वो भी कैंटोनमेंट  एरिया में
  २. हिन्दू लड़की और मुस्लिम लड़के वाला केस जिसमे पुलिस वाले शामिल थे
साहब चुनाव पास है। ....... और जरूरी नहीं है काण्ड उसी राज्य में हो जिसमे चुनाव हो। ... भावनाएं अब सोशल मीडिया के जरिये भड़काए जाते हैं। .... लेकिन कौन है जो इसका फायदा उठाना चाहता है। ... संगीत जी ठाकुर हैं और चुनाव दो प्रमुख राज्यों में है। ..मध्य प्रदेश और राजस्थान  ठाकुर कम्युनिटी वनरेबल है सत्ताधारी के लिए और हिन्दू मुस्लिम तो सदा के लिए मुद्दा रहता  ही है। कांग्रेस को मुस्लिम वोट खिसकता दिख रहा है खासतौर पर मुस्लिम वोट। ..तो  आने वाले दिनों में तैयार रहिये  कुछ और स्कैंडल्स के लिए

®atish 27th Sep 2018

Tuesday, September 25, 2018

नेताओं की परिभाषा

न हिन्दू मुसलमान को समझता है ,
न मुसलमान हिन्दू को समझता है 
न हिन्दू हिन्दुत्वा को समझता है ,
न मुस्लिम मुस्सल्लम ईमान को समझता है | 

आखिर ये लोग समझते क्या हैं फिर ?
कट्टरता बर्बरता और अपने रसूल ,
कुरीतियाँ थोथापन और बातें फ़िज़ूल ,
सुख शांति और छोड़ के चैन-ओ-अमन 
करते रहते हैं दंगे और विष वमन | 

इनको इनके इष्ट और खुदा जानते होंगे 
भटके पथिक की मानसिकता पहचानते होंगे 
शर्मसार होती मानवता को तो  जानते होंगे 
बढ़ती हुई दानवता और हविश को मानते होंगे | 

फिर खुदा ने अलग किस्म के प्राणी बनाये 
जिन्होंने सामुदायिक ताने बाने को समझा 
अपना गणित बिठाया ,भावनाएं भड़काए 
अपने स्वार्थवश औरों के चूल्हे दिए बुझा | 

धु-धु जलती श्मशान पे अपना हित साधते हैं 
चुनावी मौसम में मेढकों से टरटराते हैं 
वोट की खातिर कुछ भी कर जाते हैं 
ऐसे समझदार प्राणी नेता कहलाते हैं | 

©रतीश 



Sunday, February 11, 2018

जब विश्वास टूट जाता है 
लहरें अधीर हो जाती हैं
किनारों को तोडना चाहती हैं , l
घात ये विश्वास का जिसपे
तिकी है नीव अट्टालिका की ,     
कब तक इसे बचाऊँगा   
और विश्वासपात्र रह पाऊँगा.
 मैं स्वान नहीं प्रिये मनुज हूँ
थोड़ी करू मनमानी,
तुम नहीं समझी भलमानस को ,
नहीं इसमें तेरी नादानी
अब ऊब चूका हूँ उन ध्वनि तरंगों से
जिसके सुनने की क्षमता नहीं,
कुछ भी कर लो मैं अब
तुम में मन रमता नहीं,
जो नहीं समझ सकी दर्जन सालों में
अब क्या समझाऊंगा वेदना ,
तुम सुखी रहो बच्चों की बनो प्रेरणा .
तय कर लो अपना नियत स्थान
मेरी राह अब न ताकना,
मैं निर्झर वन का प्राणी
अब निर्वासित मुझको रहना.

Thursday, February 8, 2018

Madhur

maine chidiyon ko chahchahate suna kitni madhur thi wo , swa raag aur sur ka milan madhur sangeet ka laheriyaan. suno to unki jugalbandiyaa. usi ghane ped ke neechay kiski chhaon mei  tum sustate pakshiyaan tumhe kalrav sangeet sunante. jahan tum pran wayu paate wo desh raag gaate . Kitni madhur thi wo. 

Sangini

जो तुममें प्यार जगा दे वही संगिनि                   जो तुम्हे जीना सीखा दे वही संगिनि                जो लहरों से टकराये ,साथ तूफानी                दरिया पार कर जाए वही संगिनी
प्रेरणा पाकर जब निखर उठे लेखनी                रूप श्रृंगार पे जो खिल उठे वो संगिनी
प्रेम मनुहार पे सकुचाति पिया जो                    प्रेम आलिंगन में घुल जाये वो संगिनी
जो संघर्ष में सहर्ष हो साथ                             जो उत्कर्ष में हाथ में डाले हाथ                    पिया की प्रेम सुधा बने वही संगिनी

Saturday, May 20, 2017

अब
धर्म युद्ध
कर देगा अवरुद्ध
अकाल अचिन्त्य का ||
जब वीर प्रबुद्ध
ललकार प्रचंड
तोड़ेगा घमंड
विकराल दैत्य का ||
अब खडग
अरुणिम रक्त
बहेगा अनिरुद्ध
भाल क्षत्रिये का ||
कंपित धरा
हुंकार गगन
कर देगा शुद्ध
बीज मानवता का ||
@रतीश

Sunday, May 14, 2017

Prakriti

Chilchilati dhoop mein
Chhaon dhoondhne baitha
Main ek ped ke neechay
Sahsa ek phool aake gira
Meri goad mein
Maine saharsh uthaya
Us pyare se phool ko
Soonghne ke chesta ki
Uski sugandh ki jad mei
Aake bol utha yahi hai
Prakriti ka komal sparsh

कहते हैं " हवा पानी हो शुद्ध   महात्मा बुद्ध  "

हमारे प्राण के लिए  प्रकृति के  सबसे  महत्वपूर्ण  घटक  हैं  प्राणवायु  और जल | इनके बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है | जल के बिना आप २ या ३  दिन , मगर इससे ज़्यादा जीने की कल्पना असंभव है और वायु के बगैर तो शायद २ या ३ मिनट भी नहीं | दिल्ली में एक आंकड़े की  माने तो  40 % बच्चे किसी न किसी सांस के रोग से ग्रस्त होते हैं और कुछ तो फेफड़ों के गंभीर बिमारिओं से ग्रस्त होते हैं. | इन बच्चोँ  का यही दोष है न कि  ये दिल्ली  एनसीआर  जैसे महानगर में  पलते बढ़ते  हैं | 

अब आइये देखते हैं दूसरा पहलू , यमुना जो दिल्ली एनसीआर  के पानी का सबसे बड़ा श्रोत होता परन्तु  है नहीं | जानते हैं  क्यों ? क्यूंकि  हम, आप और औद्योगिक कचड़े की वजह से यह दुनिया की सबसे गन्दी नदियों में शुमार है | कुछ दिन पहले दिल्ली चुनाव के समय गन्दा पानी एक बड़ा चुनावी मुद्दा था | लोगों के लिए पानी दुसरे राज्यों  से पाइप  द्वारा मंगवाया जाता है जबकि यमुना जैसी  नदी के किनारे हम बसे हैं |  कोरोना की वजह से उत्तपन्न हालात ने  लॉकडाउन करा दिया और यमुना  6 0 % तक साफ़ हो गयी है | जिस नदी में झाग और काला पानी होता था वहां आप साफ़ पानी देख सकते हैं ( आजतक की रिपोर्ट )| हजारों करोड़ खर्च करके जो साफ़ न हुई वो लॉकडाउन की वजह से हो गयी |  खुश हो गए  ! लेकिन आपकी ख़ुशी जल्द ही ख़त्म हो जाएगी क्यूंकि आप और हम और उद्योग  फिर उसी  प्रदुषण को जल्दी ही पा लेंगे |

एक और पहलु है और वो है प्राणवायु की जो की लाख कोशिशों के बावज़ूद स्वच्छ नहीं हो पायी , वो भी  लॉकडाउन में साफ़ हो गयी है. लगता है पर्यावरण ने रीबूट किया  है | हम लगातार ऐसे साधनो  प्रयोग करते हैं जो की प्रदुषण के सारे तत्त्व बढ़ने में सहायक होती है जैसे अत्यधिक मोटर व्हीकल , एयर कंडीशनर  इत्यादि |

क्या आपको नहीं लगता की प्रदूषण की चेन भी  टूटनी चाहिए और प्रकृति को रीबूट का अवसर मिलना चाहिए ?
कम से कम हम अपने बच्चों को साफ़ हवा और साफ़ पानी तो दे सकते हैं. क्यों न हम पर्यावरण को साफ़ रखने में हम अपना योगदान दे  सकते हैं |  क्यों न एक मुहीम चले और स्वजागरण के तहत हम सरकार को भी सहभागी बनाये ? क्या कहते हैं आप ? 

Tuesday, December 13, 2016

बुरा हाल

पूँजी भी अपनी है ,बैंककर्मी भी अपने हैं , सरकार भी अपनी है और  नेता भी अपने हैं | भ्रष्टाचार भी अपना है , घूसखोरी भी अपनी है ,जमाखोरी भी अपनी है और  मिलावटखोरी भी अपनी है  । दुराचार भी अपना है , अनाचार भी अपना है , कदाचार भी अपना है  और व्यभिचार भी अपना है ।  फिर क्यों कहते हैं यात्रा  अंतहीन है , इसमें प्रजा भटकते हुए त्रस्त है ,  । अगर कुछ अपना नहीं है तो ये व्यवस्था , शिक्षा ,गुण और संस्कार । ब्रितानी सँस्कारो में पले नेहरू ने देश को रखा गिरवी और बाकी कसर इंदिरा,राजीव और सोनिया ने पूरी करदी । 

Wednesday, October 19, 2016

अनुराग कश्यप ने भारत के प्रधान सेवक पर प्रश्न उठाये हैं! बिलकुल आपका हक़ है ये की अपने प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ा कीजिये । लेकिन कोइ सॉलिड मुद्दा तो होना चाहिए । मैं पूछता हूँ की पाकिस्तानी को काम पे नहीं लिए होते तो तुम्हे क्रिएटिव लिबर्टी नहीं मिलती ? तुम्हारे जैसे लोगों के लिए फिल्म बनाना जूनून है लेकिन इसका ये मतलब थोड़े ही है की राष्ट्रहित को ताक  पे रख दो. उनका भी ख्याल करो जिनके लिए राष्ट्र की रक्षा ही उसका जूनून है. सैनिक राष्ट्र की सेवा करते हैं जब हालात ऐसे हों  तो प्रधान सेवक से प्रश्न करने से पहले ये तो सोच लो की तुम्हारे वक्तव्य से उनका मनोबल भी तो गिरता है. सबके मनोबल की जिम्मेदारी प्रधान सेवक की है लेकिन उसके मनोबल को भी तो बनाये रखना है !  मुझे लगता है गलती तुम्हारी नहीं है , तुम्हारा चुना हुआ प्रोफेशन ही ऐसा है जहाँ आधे से ज्यादा लोग अधकपाड़ी होते हैं. फ़िल्मी लोग ऐसै ही होते हैं , रील की दुनिया ही  उन्हें अपनी लगती है । तुम्हारे लिए फिल्मे बनाना सबकुछ नहीं होना चाहिए । माना  कि फिल्मों के लिए जुनूनी हो लेकिन थोड़ा जूनून देश के लिए भी रखो फिर देखो ! 

Wednesday, August 10, 2016

चलिए मान लेते हैं आपकी बात काटजू साब की आप निहायत साइंटिफिक बात करते हैं और बहुत ही तार्किक इंसान हैं. आप भूतपुर्व जज भी रह चुके हैं । आप कहते हैं हिन्दू धर्म में बहुत बुराइयां हैं , जात पांत का भेदभाव है , कुरीतियां हैं , अन्धविश्वास है , इत्यादि इत्यादि । बुजुर्ग हैं आप लेकिन ऐसे तो बिलकुल नहीं जिनको  फॉलो किया जाए । जज रहे हैं तो तर्क प्रधान होंगे ही । अमेरिका वाले , जापान वाले ,चीन वाले , यूरोपियन्स सब गाय मार कर खाते हैं , सब बेवकूफ तो नहीं  और हम नहीं खाते हैं इसलिए श्रेष्ठ तो नहीं ! बिलकुल सही तर्क है । लेकिन सबसे पहला तर्क की किसी को मार के खाना ठीक है चाहे वो एक निरीह प्राणी ही क्यों न हो ? दूसरा जिसको मार दिया , और अब जो मार हुआ है उसे पका के खा जाना क्या सइंटिफिकल्ली ठीक है ? अगर दुनिया के ६ अरब लोग सब गाय मार के खाने लगे तोह इतने गाय कहाँ से पैदा करोगे काटजू साब की सबकी इक्छा पूर्ती करोगे । एक गाय मारने के बाद उसके मांस को खाने लायक बनाने के लिए १००० लीटर से ऊपर पानी लगता है और गाय का बेकार हिस्सा जो की खाने लायक नहीं है फ़ेंक दिया जाता है । इतना पानी क्या आपकी रचित कोई आइलैंड से  लाएंगे और कचरा किसी तीसरी  दुनिया के देशों में फेंकेंगे ? हज़ारों गाय के काटने से जितना प्रदुषण होता है उसको आपकी शरीर  से निकली विशेष गैस तो शुद्ध नहीं करेगी न ।  आप खाएं बेशक खाएं , हिन्दू मुर्ख है अगर नहीं खाता है तो , मुर्ख ही अच्छा है । आपकी तरह पश्चिम परस्त नहीं बनना है । हिन्दू न खा के ज़िंदा भी है और दुनिया की सबसे उम्दा कौम भी है । शायद हम शान्ति परस्त और शान्ति पसंद कौम हैं तो इसका सबसे बड़ा कारण है हम जीवों के प्रति दयालु हैं! हम जीवों को जीने का उतना ही अधिकार देना पसंद करते हैं जितना हमे है । मुझे ताजुब्ब होता है की आप सुप्रीम कोर्ट के जज थे ! हो सकता है मैं भ्रम में हूँ की सुप्रीम कोर्ट के जज के पास अच्छी तर्क शक्ति  और स्थिर दिमाग होता है । भारत के संविधान में भी आपका विश्वास था /है या नहीं ।   काटजू साब अगर आपने हिन्दू धर्म को ठीक से समझा होता तो शायद ऐसी बात नहीं करते । 

Tuesday, August 9, 2016

अगस्त २०१६ का पहला हफ्ता ब्रेअस्ट्फीडिंग वीक ( स्तनपान सप्ताह ) के रूप में मनाया गया !! भारत में भी अपने स्वास्थ्य मंत्री कुछ WHO के अँगरेज़ अधिकारी और चलचित्र में अदाकारा माधुरी दिक्षित नेने के साथ स्तनपान सप्ताह मना रहे थे. चलिए कुछ तो सही , प्रयास तो है की भारत की माँ की दूध की लाज रखने वाले नौनिहाल  आगे भी होंगे नहीं तो बहुराष्ट्रीय संस्थाएं ने तो दूध का पाउडर बेच के नौनिहालों के ऊपर माँ के दूध का कर्ज चढ़ने नहीं दे रहे थे । बल्कि अपना व्यापार बढ़ा के भारतियों के मन में नयी सांस्कृतिक चेतना जग रहे थे की बहिन तुम दूध की चिंता मत करना उसका इंतेजाम है , हमारा पाउडर बिलकुल आपके लाल के लिए शुद्ध और माफिक रहेगा  ।  गौ के दूध में ऑक्सीटोसिन नामक अमृत मिला होता है आजकल  इसलिए अब वो ज्यादा पोषक हो गया है ,जो कि आपके बच्चे के लिए अपच हो सकता है !!! माताओं बहनो अपने बच्चे को दूध पिलाने की झंझट से बचिए और हम आपको ऐसी लाइफ जीने का अवसर देना चाहते हैं जिसमे आपको हर सार्वजनिक जगह पे अपना स्तन स्तनपान  के लिए उघाड़ना न पड़े  और लज्जित न होना पड़े ! बिलकुल वैसा ही जैसा पश्चिम के देशों में होता है ! वहां नारी को अपनी सुंदरता और सुविधा की चिंता होती है , बच्चे को तो दूध पिलाने के लिए ढेरों ब्रांड्स के न्यूट्रिशियस दूध हैं न , वो सारे के सारे वहीँ के फ़ूड एंड ड्रग डिपार्टमेंट से सर्टिफाइड भी होतीं हैं ।माफ़ कीजिये जरा कटु शब्दों का प्रयोग कर रहा हूँ. लेकिन भारत के मध्यमवर्ग को अपनी ही सभ्यता पर शर्म आती है और ये शर्म करना हमें हमारे ब्रिटिश भाग्य विधाताओं ने सिखाया है !
                                                       अब ऐसे बहुराष्ट्रीय संस्थाओं को भारत में पैर पसारने से रोकने की बात हो रही है ! अब माताओं और बहनो को जागरूक बने रहने का प्रयास हो रहा है ! इसमें ब हुत खर्च भी होगा ! प्रचार करना होगा , शिक्षित करना होगा , उन सभी गुणों से परे  जो हमारी देश की बहुत सारी नयी माएं इन्टरनेट के जरिये जुटाती हैं !! ये स्तनपान सप्ताह उन्ही लोगों को सूट भी करता है जो भारतीय सभ्यता से दूर हो चुके हैं।  आज भी आप गांव में जाये तो आपको अभी भी बच्चों की ऑन डिमांड दूधू  सेवा पैदाइश के ३ साल तक बच्चों अपनी माता से स्नेह और लाड के साथ  मिलती है !  WHO  और पश्चिम  देशों की सरकारें कितना प्रयास करती हैं की पश्चिमी माताओं को यह सिखाया जाये की स्तनपान उनके और बच्चे दोनों के लिए उत्तम है ! मगर उनको कहाँ समझ में आती है , उन्हें आप बच्चों को लेके बड़े आराम से सुट्टा फूंकते देख सकते हैं. क्या उन्हें ये समझ नहीं आती है की ये सिगरेट का ये फैशन और वो भी बच्चों के सामने कितना घातक है ! शायद ये भी कोई संस्कार ही होगा जिसके तहत माँ अपने बच्चे को सुट्टा से इम्यून बना रही होंगी ! जो भी हो एक बहस तो है ही की पहले समाधान की नक़ल करो फिर समस्या अपने आप खड़ी  होती जाएगी !  डब्बाबंद दूध एक समाधान था लेकिन विशेष परिस्थितियों में , मगर धीरे धीरे वही समाधान एक समस्या बनकर खड़ी हैं ! 

Friday, February 5, 2016

लघु कथा शिल्प सृजनशक्ति का भरपूर उपयोग करती है।  गागर में सागर भरना कहते है इसे ।
आईये अपनी सृजनात्मकता का भरपूर आनंद उठाएं , जुड़े , जोड़ें और अभिव्यक्त करें ।
रामावतार को बिटिया की शादी करनी थी । सोलवां चढ़ गया था नीलुआ को ,अचरज थी एकदम । बेनियाचक से रामेशवर माट्साब के घर का रिश्ता था ।  ४ बीघा जमीन ,ट्रैक्टर ,पेंसन ,पक्का मकान क्या नहीं था , बीए पास कम्पटीशन की तैयारी कर रहा था सुनील  । ५ लाख नगद का डिमांड हुआ था और बाकी सब तो थैये था लिस्ट में । अब तो खैनी की फसल उम्मीद टिकी थी कि बेटी विदा हो जाये तो देवघर जल चढ़ाएंगे बाबा को ।  फसल अच्छी हुई थी ।  खेत लहलहा रहे थे ,खैनी के पत्ते बेतरबिब बड़े हो रहे थे और उतना ही सीना चौड़ा हो रहा था रामावतार का । बस कुछ ही दिनों में बिटिया के हाथ पीले होने वाले थे ।  टेंट  वाला ,हलवाई ,गाडी वाला , जनमासा सब का इन्तेजाम हो गया था । डेढ़ महीने बाद तिलक और उसके के एक हफ्ता बाद शा दी थी ।फसल भी कटने  वाली थी । कलकत्ता वाली पार्टी ने पांच हजार रुपये बयाना भी दे दिया था । पचीस हजार रुपये कट्ठा के हिसाब से तय हुआ था दाम। पूरे ३० कट्ठा में थी फसल । मार्च का आखिरी हफ्ता था । बेमौसम बादल दिख  रहे थे । दोपहर में थोड़ी बूंदा बांदी हो गयी । शक्ति का  संतुलन था ये । रामवतार जैसे इंसान हो सतर्क करने के लिए काफी था। दो हफ्ता तक कोई बादल नहीं दिखा । रामवतार शहर गया था  शादी के  कपड़े ,सामान खरीदने । घर पर हिदायत दे दी थे खेत पर हमेशा पहरा रहे । अप्रैल महीना शुरू ही हुआ था । गर्मी महीना पाँव पसार रहा था । पर जिस बदरी का  अंदेशा नहीं के बराबर था वो अचानक धूल भरी आंधी के साथ साक्षात्  यम बनके पहुंचा । रामवतार आधी खरीदारी छोड़ के मोटरसाइकिल निकाल के घर की तरफ भागा । धूल भरी आंधी उसका रास्ता रोक रहे थे । ईश्वर ने बेटी जो दिया था परीक्षा तो लेगा ही । जैसे जैसे बादल  घने हो रहे थे\वैसे रामवतार की  मोटरसाइकिल की रफ़्तार बढ़ रही थी और उसकी धड़कन की  भी । न जाने क्या लिखा है नीलुआ के किस्मत में ? हे इंद्रदेव आज न बरसिउ ।

 बरखा शुरू हो गयी और  ओले भी । रे हे रे पन्नी निकाल , जल्दी ला ।  फैलो एकरा । रे हे रे  सब कोना से  पकड़ ।  एगो  और पन्नी निकाल ।  बड़का वाला ।  तीस कट्टा  में  न है  रे । रे हे रे  जल्दी कर । 

किसी तरह खेत को ढक  पाये ।  तब तक ओलों ने अपना काम कर दिया था । ओलों ने पत्तों में नहीं बल्कि रामवतार के हृदय में छेद  कर दिया था ।  आधी कीमत भी नहीं रह गयी फसल की । बड़ी मुश्किल से तो पार्टी फसल लेने को भी तैयार हुई ।  नीलुआ  विदा तो हो गयी लेकिन बाप बेचारा साहूकार के चक्रवृद्धि ब्याज में धंस गया । अब तो मिनिया भी बारह की हो गयी है , सरवन  का पढाई ऊपर से चक्रवृद्धि ब्याज ।

बिटिया

चंचल को दो महीने हो गए बिछावन पकडे हुए। इलाज़ के नाम पे ढेला न हुआ था । दो साल पहले जब कॉलेज से अव्वल नम्बरों से पास हुई थी तो बाउजी ने चुपके से चुपके से उसे नया स्मार्ट फ़ोन लाके  दिया था जिसकी चार्जिंग हमेशा पड़ोस के घर में होती थी इस डर से की अगर उसकी  सौतेली माँ ने देख लिया तोह ।  एक दिन उसी  फ़ोन पे  इंटरव्यू कॉल भी आया था । महिंद्रा के शोरूम  में सेल्स एग्जीक्यूटिव की नौकरी का ।  पंद्रह हजार तनख्वाह और एक नया दुपहिया  ऑफिस आने जाने के लिए । चंचल की तपस्या काम आ गयी । ऑफर लेटर ले के घर में पहुंची तो खुश होने के बजाय घबरा गयी । सौतेली माँ कैसी  प्रतिक्रिया देगी पता नहीं  ! फ़ोन लगाया उसने बुआ को । बुआ ने बोला पहली तनख्वाह मिलते हे अलग कमरा ले ले और किसी की परवाह न करे । पापा घर पे नहीं थे ,मिकी खेलने गया था । ललिता चंचल की चाल भांप गयी ,उसे लग गया की चंचल कुछ अच्छा खबर लायी है । दिमाग की बत्ती जल गयी की आगे क्या करना है ? चंचल को ललिता  का व्यवहार बदला बदला सा लगा ।  १ महीने में चंचल उसके झांसे में आ गयी । रोज सुभह नास्ता बनाके ऑफिस जाती और शाम को आके खाने में हाँथ बटाती । पहली तनख्वाह से  भोले बाबा को लड्डू चढ़ा के सारा पैसा महतारी को दे दी , आखिर यही तोह उसके पापा भी करते थे । जब तक तबियत खराब न हुई तब तक तोह सब ठीक था । पापा की नयी बाइक आ गयी , मिकिआ का म्यूजिक सिस्टम ,मैया का नया सोने का हार । जिस दिन तबियत बिगड़ी बेचारी चंचल असहाय हो गयी । दो दिन की छुट्टी ली थी और आज एक महीना हो गया ज्वर गया नहीं । आज तक डॉक्टर को नहीं दिखाया । कोई कहे तोह ललिता देवी कह देती ,"अरे दवाई घोंटती ही नहीं है ज्वर कहाँ से उतरेगा , कहाँ कहाँ से   इलाज नहीं कराया लेकिन इसको न जाने कौन सा मरज  पकड़ लिया है "। सबको पता था अब चंचल नहीं बचेगी । नौकरी भी कबतक रहती, प्राइवेट  थी  ।  चंचल बेसुध बेचारी ,न जाने किसका राह जोह रही थी । बुआ को पता लगा तो आई लेकिन देर हो चूका था । डॉक्टर ने भी बचने की कोई उम्मीद  छोर दी और बोले बहुत देर कर दी । तीसरे महीने का पहला दिन , तेज धुप , धुल  और उतना  तेज ज्वर । चंचल के  मुहं से बुआ बुआ निकला और  इहलीला ख़त्म हो गयी ।  धरम बाबू की बिटिया विदा ने सदा के लिए विदा ले लिया  ।  @रतीश 

Saturday, November 15, 2014

कहाँ से लाऊँ इतने बुद्धा

कहाँ से लाऊँ मैं इतने राम की जन जन में रावण बसा है!
कहाँ से लाऊँ मैं इतने श्याम की हर मन में दुर्योधन बसा है!!!!
कहाँ से लाऊँ इतने बुद्धा  यहाँ  कि हर मन में  दावानल  बसा है |
कहाँ  से  लाऊँ इतने  चन्द्रगुप्त  यहाँ कि हरीजन में जीतन बसा   है |
कहाँ से लाऊँ इतने ओजस्वी यहाँ  कि हर जीव में मौन मोहन बसा है ।
कहाँ से लाऊँ इतने तेजस्वी  यहाँ  कि हर तन  में कुम्भकरण  बसा है ।
कहाँ से लाऊँ मैं इतने राम की जन जन में रावण बसा है!
कहाँ से लाऊँ मैं इतने श्याम की हर मन में दुर्योधन बसा है!!!!

Friday, June 7, 2013

कर्मयोग



अर्जुन बोले - हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्‍ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझ भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?॥१॥

आप मिले हुए-से वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं। इसलिए उस एक बात को निश्‍चित करके कहिये जिससे मैं कल्याण को प्राप्‍त हो जाऊँ॥२॥

श्रीभगवान बोले - हे निष्पाप! इस लोक में दो प्रकार की निष्‍ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है। उनमें से सांख्ययोगियों की निष्‍ठा तो ज्ञानयोग से और योगियों की निष्‍ठा कर्मयोग से होती है॥३॥

मनुष्य न तो कर्मो का आरम्भ किये बिना निष्कर्मता को यानी योगनिष्‍ठा को प्राप्‍त होता है और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानी सांख्यनिष्‍ठा को ही प्राप्‍त होता है॥४॥

निःसन्देह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता; क्योंकि सारा मनुष्यसमुदाय प्रकृतिजनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है॥५॥

जो मूढ़बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता हैं, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है॥६॥

किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचारण करता है, वही श्रेष्‍ठ है॥७॥

तू शास्‍त्रविहित कर्तव्यकर्म कर; क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्‍ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा॥८॥

यज्ञ के निमित्त किये जानेवाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मनुष्य समुदाय कर्मों स बँधता है। इसलिए हे अर्जुन! तू आसक्ति से रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही भलीभाँति कर्तव्यकर्म कर॥९॥

प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उसने कहा कि तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्‍त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करनेवाला हो॥१०॥

तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्‍त हो जाओगे॥११॥

यज्ञ के द्वारा बढाये हुए देवता तुम लोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्‍चत ही देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओं के द्वारा दिये हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिये स्वयं भोगता हो, वह चोर है॥१२॥

यज्ञ से बचे हुए अन्न को खानेवाले श्रेष्‍ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते है और जो पापी लोग अपना शरीर-पोषण करने के लिए ही अन्न पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं॥१३॥

सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते है, अन्न की उत्पत्ति वृष्‍टि से होती है, वृष्‍टि यज्ञ से होती है औऱ यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होनेवाला है। कर्म समुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्‍ठित है॥१४-१५॥

हे पार्थ! जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार परम्परा से प्रचलित सृष्‍टिचक्र के अनुकूल नहीं बरतता अर्थात अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह इन्द्रियों के द्वारा भोगों में रमण करनेवाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है॥१६॥

परन्तु जो मनुष्‍य आत्मा में ही रमण करनेवाला और आत्मा में ही तृप्‍त तथा आत्मा में ही सन्तुष्‍ट हो, उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है॥१७॥

उस महापुरुष का इस विश्‍व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मोंकि न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है। तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी इसका किंचिन्‌मात्र भी स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं रहता॥१८॥

इसलिए तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्यकर्म को भलीभाँति करता रह। क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्‍त हो जाता है॥१९॥

जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्तिरहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्‍त हुए थे। इसलिए तथा लोक संग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने के ही योग्य है अर्थात तुझे कर्म करना ही उचित है॥२०॥

श्रेष्‍ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते है। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है॥२१॥

हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्‍त करने योग्य वस्तु अप्राप्‍त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ॥२२॥

क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाए; क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते है॥२३॥

इसलिए यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्‍ट-भ्रष्‍ट हो जाए और मैं संकरता का करनेवाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्‍ट करनेवाला बनूँ॥२४॥

हे भारत! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्तिरहित विद्वान भी लोक संग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे॥२५॥

परमात्मा के स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह शास्‍त्रविहित कर्मों में आसक्तवाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात् कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे। किन्तु शास्‍त्रविहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवावे॥२६॥

वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते है तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है॥२७॥

परन्तु हे महाबाहो! गुणविभाग और कर्मविभाग के तत्त्व को जाननेवाला ज्ञानयोगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे है, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नही होता॥२८॥

प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझनेवाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जाननेवाला ज्ञानी विचलित न करे॥२९॥

मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझे में अर्पण करके आशारहित, ममतारहित और सन्तापरहित होकर युद्ध कर॥३०॥

जो कोई मनुष्य दोषदृष्‍टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुकरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं॥३१॥

परन्तु जो मनुष्य मुझ में दोषारोपण करते हूए मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते हैं, उन मूर्खों को तू सम्पूर्ण ज्ञानों मे मोहित और नष्‍ट हुए ही समझ॥३२॥

सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्‍त होते है अर्थात अपने स्वभाव के परवश हुए कर्म करते हैं। ज्ञानवान भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्‍ठा करता है। फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा?॥३३॥

इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में अर्थात प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिये, क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विध्न करनेवाले महान शत्रु हैं॥३४॥

अच्छी प्रकार आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देनेवाला है॥३५॥

अर्जुन बोले - हे कृष्ण! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात लगाये हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है?॥३६॥

श्रीभगवान बोले - रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है, यह बहुत खानेवाला अर्थात् भोगों से कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है, इसको ही तू इस विषय में वैरी जान॥३७॥

जिस प्रकार धूएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढका जाता है तथा जिस प्रकार जेर से गर्भ ढका रहता है, वैसे ही उस काम के द्वारा यह ज्ञान ढका रहता है॥३८॥

और हे अर्जुन! इस अग्नि के समान कभी न पूर्ण होनेवाले कामरूप ज्ञानियों के नित्य वैरी के द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढका हुआ है॥३९॥

इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि - ये सब इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है॥४०॥

इसलिए हे अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक माल डाल॥४१॥

इन्द्रियों को स्थूल शरीर से पर यानी श्रेष्‍ठ, बलवान और सूक्ष्म करते हैं; इन इन्द्रियों से पर मन है, मन से भर पर बुद्धि और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर हैं वह आत्मा है॥४२॥

इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म, बलवान और अत्यन्त श्रेष्‍ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल॥४३॥

ॐ तत्सदिति श्रीमद्‍भगवद्‍गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः॥३॥
-----हर हर महादेव..........जय अम्बे

आर्यावर्त भरतखण्ड संस्कृति
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